वह बूँद बन बरसे तेरे आँगन में ,
यह बादलों को मंज़ूर नहीं। …

वह फूल बन खिले तेरे आँगन में,
यह कुदरत को मंज़ूर नहीं।

आज फूल बन खिल रही है अपने आँगन में ,
यह कुदरत को मंज़ूर और यह ख़ुदा का नूर है.

जिस कश्ती पर वह बैठी है ,
उस पर वह अकेले नहीं।
उस कश्ती को डूबने से उसे बचाना है ,
सबको खुश रखना और सबको हँसाना है.

माफ करना उसे तेरी कश्ती खाली रह गयी

पर तेरी कश्ती इतनी कमज़ोर नहीं ,
तेरी इक्षाएं इतनी मजबूर नहीं।

जब बारिश बन वह बरसे तेरे आँगन में ,
अब वह दिन दूर नहीं। ……….
वह दिन दूर नहीं। …..

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